क्या हम स्वयं अपने भाग्य विधाता हैं।
वास्तव में आपको चाहिए क्या?
क्या आपको अकूत संपत्ति चाहिए? सुरक्षित नौकरी चाहिए? शानदार बंगला चाहिए? क्या आपको आरामदायक कार चाहिए? अपने खेतों में भरपूर फसल चाहिए? अपने व्यापार में उन्नति चाहिए? अपने परिवार का सहयोग चाहिए? योग जीवन साथी चाहिए? कसा हुआ बलिष्ठ शरीर चाहिए? क्या आपको कोई खास डिग्री चाहिए? खुद की सच्ची पहचान चाहिए? सफलता सुख और शांति चाहिए?
यदि इसमें से कोई एक या सभी चाहिए तो एक जबरदस्त अनुभूति के लिए तैयार हो जाइए।
क्योंकि जब आप इस पुस्तक को पढ़ने का काम कर लेंगे तब आप अपनी जिंदगी में कुछ चाहिए उसे प्राप्त करने का श्रेष्ठ मार्ग तलाश कर चुके होंगे।
यह मार्ग अन्य सभी मार्गो से अलग है कारण यह है कि इसका आपकी शिक्षा से कोई संबंध नहीं है और ना ही तुम्हारे धर्म से कोई संबंध है।
इतना ही नहीं आपके भाग्य से साथ ही इसका कोई संबंध नहीं है। ऐसा है जिससे आप आसानी से अपना सकते हैं।
अपने व्यक्तित्व की जिन बातों के ऊपर आपका सीधा साधा और पूर्ण अधिकार उन बातों के विषय में ही इस पुस्तक में लिखा गया है इसलिए तो हम विश्वास पूर्वक यह कह सकते हैं कि इस पुस्तक में दिखाए गए तरीके से काम करेंगे तो स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए सूत्र को वास्तव में सत्य प्रमाणित कर सकते हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था आप स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं।
यह पुस्तक पढ़ने के बाद आप भी कहेंगे कि सत्य बात है मैं ही मेरे भाग्य का विधाता हूं।
सूक्ष्म हकीकत ठोस हकीकत
कोई भी मकान वास्तविक भूमि पर आकार लेने के पहले उसके मालिक के मन में आकर बना लेता है मकान मालिक अपने आर्किटेक्ट के साथ मिलकर मन में रहे मकान के विचार को कोरे कागज पर उतारता है। आर्किटेक्ट की मदद से इसमें महत्वपूर्ण विशेषताएं आकार लेती है इसके बाद स्ट्रक्चर डिजाइन की मदद से स्ट्रक्चर की डिजाइन को तैयार किया जाता है।
सिविल इंजीनियर इस डिजाइन के अनुसार मकान का वास्तविक आकार व रूप देने का कार्य शुरु करता है फिर कारीगर और मजदूर सहयोग से आखिर में धरती पर मकान वास्तविक आकार पर लाते हैं।
मन का सूक्ष्म रूप वाला मकान धरती पर वास्तविक आकार लेता है मानसिक मकान भौतिक मकान बनता है इस संपूर्ण प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण यदि कुछ है तो वह है मालिक के मन में अपने स्वयं के मकान के विषय में बने विचार।
जिंदगी में जिंदगी में ऐसा ही होता है आज की भौतिक दुनिया आपसे मानसिक चित्रों व विचारों का ही परिणाम है।
जिंदगी में भी ऐसा होता है आज की जो आप दुनिया है वह आपके मासिक विचारों चित्रों का परिणाम है अपनी जिंदगी के विषय में हमारे मन में जाने-अनजाने जो विचार या चित्र खड़े किए हैं वैसे ही जिंदगी हम भी जी रहे हैं।
यदि आपको अपने भौतिक दुनिया बदल ली है तो जिंदगी के विषय में मन में जो विचार हैं जो चित्र हैं उन्हें बदलना पड़ेगा अपनी मानसिक दुनिया में सुख और समृद्धि के नए चित्र तैयार करना आपके हाथ में है यह सब कैसे हो सकता है यह विचार छोड़ें यह पुस्तक इसलिए।
मानसिक दुनिया में,
सूक्ष्म रूप से सृजित होता है ।
वास्तविक दुनिया में वह,
स्थूल रूप से सृजित होता है।।

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