बृहस्पति भगवान के व्रत की कथा और पूजन की विधि

अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा और पुण्य प्रताप विधि


बृहस्पति भगवान के व्रत की कथा और पूजन की विधि

इस दिन सुबह-सुबह उठकर ब्रह्म मुहूर्त में शौचालय करने के बाद और  स्नान करने के बाद बिना कुछ खाए हुए केले की जड़ में जल से अर्ग्य  देकर इसी हल्दी तथा चने की दाल से भगवान विष्णु का ध्यान पूजन करें इसके बाद चने की दाल तथा थोड़ा  प्रसाद रखें फिर शुभ घृत का दीपक जलाएं। 

ओम मंत्रादि आसन पर बैठकर जाप करें उसके पश्चात वही पर वृहस्पति भगवान की कथा करें तथा अन्य व्यक्तियों को सुनावें।  कथा के पश्चात हल्दी से गौ का पूजन का एवं चने की दाल तथा गुड़ गौ को खिला दे इसके  पश्चात एक बार पीले चना बेसन के निर्मित शुद्ध शाकाहारी, बिना नमक का भोजन करें व्रती को इस  दिन प्याज, लहसुन, मदिरा, वह माँस  का सेवन नहीं करना चाहिए।  तथा नियम पूर्वक रखना चाहिए। 

बृहस्पति ग्रह के कष्ट निवारक गुरुदेव की प्रसन्नता के लिए पूजा के पश्चात आसान  पर एकाग्रचित से निम्न मंत्रों मे से  किसी एक की ग्यारह माला हर बृहस्पति को 16 बृहस्पति तक जपें उसके बाद अग्नि मे हवन करें और  ब्राह्मण को भोजन कराए।  इससे ग्रह के कष्ट का निवारण होता है तथा गुरुदेव की कृपा बानी  होती है।

एकाक्षरी बीज मंत्र _ ओम ब्रह्म बृहस्पतये  नमः
तांत्रिक मंत्र _ ओम ग्रां ग्रीं  ग्रौं सः गुरवे नमः 
हवन सामग्री- काला तिल, चावल, जौ,  बूरा, घृत  तथा  चंदन चूरा  एवं आवश्यकतानुसार आम की लकडी।

अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा/ गुरुवार व्रत कथा 

प्राचीन काल में एक राजा राज्य करते थे वे बड़े प्रताप  तथा दानी थे।  वे प्रतिदिन मंदिर में दर्शन करते थे गुरु ब्राह्मण की सेवा किया करते थे उनके दरवाजे पर कोई निराश नहीं जाता था।  वह हर गुरुवार का व्रत तथा पूजन करते और गरीब  कि सहायता करते परंतु यह बातें उनकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी।  वह किसी को एक पाई का दान न  दे तथा राजा से ऐसा करने को मना आवश्य करती थी।  

 एक दिन राजा शिकार खेलने जंगल में गए रानी और उसकी दासी अकेले थी, उस समय बृहस्पति भगवान् जी साधु का रूप धारण करके उसके दरवाजे पर भिक्षा मांगने गए तब रानी ने कहा साधू महाराज मैं इस दान व पुण्य  से बहुत तंग आ गई हूं।  मुझसे तो घर का ही कार्य समाप्त नहीं होता है, इस काम के लिए तो मेरे पतिदेव ही बहुत हैं इस प्रकार की कृपा करें कि यह सब धन नस्ट हो जाएँ साधू महाराज ने कहा तुम बड़ी विचित्र हो संतान धन से कोई दुखी नहीं होता इसको तो सभी मनुष्य चाहते हैं।  

अगर आपके पास संपूर्ण धन है तो आप उससे धर्मशाला,कूवाँ, तालाब, बावड़ी, बाग, बगीचा आदि का निर्माण करवाओ निर्धन मनुष्यों की कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ।  और धर्म कार्य में धन का प्रयोग करो तुम्हारा कुल का नाम लोक प्रसिद्ध होगा।  और तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

 परंतु रानी को इस बात से खुशी ना हुई वह बोली हे महाराज मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं जिसका मैं और अन्य मनुष्यों को दान दो तथा इसको रखने उठाने में मुझे मेरा समय बर्बाद होता है।  साधु ने कहा हे देवी यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो जैसा कहता हूं वैसा करना बृहस्पति वार के दिन घर को लीप  अपने सिर के बालों को धोते हुए स्नान करना राजा से कहना व हजामत बनाएं भोजन में मांस मदिरा आदि खाए कपड़े धोबी को धुलने को  दें।  इस प्रकार सात  गुरुवार तक वह ऐसा करें तुम्हारा सब धन नष्ट हो जाएगा,ऐसा कहकर साधु चले गए।
रानी ने साधु के कहे अनुसार ही सब कुछ किया और तीन बृहस्पतिवार होते ही  उसका सब कुछ नष्ट हो गया।   दोनों लोग भूख प्यास से तड़पने लगे और संसार के सभी रोगों  से घिर  गए।  तब राजा ने कहा कि यहां तो सब मुझे जानते हैं मैं परदेस जाऊंगा कमाने के लिए ऐसा कहकर राजा चला गया। 

 वहां जाकर वह जंगल से लकड़ी काटकर जीवन व्यतीत करने लगा इधर रानी और उसकी दासी दोनों दुखी हो गए उनको किसी दिन भोजन मिलता था और किसी दिन वह जल पीकर ही सो जाती थी।  एक बार रानी और दासी को 7 दिन तक कोई भी भोजन नहीं मिला तब रानी ने कहा कि पास में ही मेरी बहन रहती है वह धनवान है तो उसके पास जा और 5 बेझर मांग कर ले आ  जिससे हमारा कुछ समय के लिए गुजारा हो जाएगा।  रानी की आज्ञा मान उसकी बहन के पास गई दासी।

परंतु रानी की बहन उस समय उस समय पूजा कर रही थी।  और वह दिन गुरुवार का था जब दासी ने रानी की बहन को देखा तो उससे बोली है रानी मुझे तुम्हारी बहन ने भेजा है, अतः मेरे लिए पांच सेर बेझर दे।  दासी के अनेक बार कहने पर भी  कोई उत्तर न दिया क्योंकि गुरुवार के व्रत के दिन व्रत की कथा सुनते हुए कोई उत्तर नहीं देते हैं।  रानी की दासी ने कई बार बोला और वह गुस्सा कर वापस चली आई और आकर बोली कि तुम्हारी बहन छोटे मनुष्यों से बात भी नहीं करती है। 

 तब रानी ने कहा कि उसका कोई दोष  नहीं है।  अच्छे और बुरे का पता आपत्ति काल में ही लगता है जैसे ईश्वर की इच्छा होगी वैसा ही होगा यह सब हमारे भाग्य का दोष हैं।  उधर उस रानी ने देखा कि मेरी बहन की दासी आई थी पर मैं उससे नहीं बोली इससे बहुत दुखी होगी यह सोचकर कथा को सुन भगवान का पूजन समाप्त करके वह अपनी बहन के घर चली गई।

वहां अपनी बहन से कहने लगी कि हे बहन मैं ब्र्रह्स्पतिवार का व्रत कर रही थी तुम्हारी दासी गई, परंतु जब तक कथा होती है तब तक बहन ना तो उठते हैं और ना बोलते हैं इसलिए मैंने बोली कहो दासी क्यों आई थी। 
 रानी बोली हमारे यहां खाने को कुछ भी नहीं था इसलिए मैंने दासी को तुम्हारे पास में भेजा था,  रानी बोली रानी की बहन बोली देखो बृहस्पति भगवान सभी की मनोकामना को पूर्ण करते हैं।  शायद तुम्हारे घर में कहीं ना कहीं अनाज रखा होगा इस प्रकार से बहन के वचन सुनकर रानी ने घर के अंदर गई और वहां उसने देखा तो उसे अनाज  मिल गया उसे बहुत ही ज्यादा प्रसन्नता मिली।  अब रानी और दासी बहुत ही ज्यादा प्रसन्न  है।  तब दासी ने बोला वैसे भी हमें भोजन ना मिलने के कारण हम रोज ही व्रत रहते हैं।  अपनी बहन से व्रत की विधि पूछ लो और कथा जान लो तब उस रानी ने अपनी बहन से पूछा है बहन बृहस्पतिवार के व्रत की कहानी क्या है ? और यह व्रत कैसे करना चाहिए। 

 तब उसकी बहन ने कहा गुरु के व्रत में चना की दाल गुड मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं पीला भोजन करें तथा कथा  सुने ऐसा करने से गुरु भगवान प्रसन्न होते हैं।  और धन अन्य पुत्र परिवार सभी देते हैं और सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं। तब रानी और दासी दोनों निश्चय किया कि हम भी बृहस्पति भगवान का पूजन अवश्य करेंगे 7 दिन के बाद जब बृहस्पतिबार आया तो उन्होंने व्रत रखा। 

दासी घुड़साल  जाकर चना गुड़  व दाल से केले की जड़ की विष्णु भगवान का पूजन किया।  किंतु पीला भोजन कहां से आए यह विचार का बड़ी दुखी हुई किंतु उनके व्रत से गुरु भगवान प्रसन्न हो गए थे तो 2 थालों में सुंदर पीला भोजन लेकर आए और दासी को देखकर बोले हैं दासी यह तुम्हारे और तुम्हारी रानी के लिए भोजन है। 

तुम दोनों इसी भोजन को करना दासी भोजन को पाकर बड़ी प्रसन्न होकर रानी से बोली रानी जी भोजन कर लो, रानी को इस विषय में कुछ भी पता नहीं था इसलिए बोली तू ही भोजन कर क्योंकि तू हमारी व्यर्थ में हंसी उड़ाते हैं, एक महात्मा भोजन दे गए हैं रानी कहने लगी और भोजन तेरे लिए दे गए होंगे तू ही कर ले दासी ने कहा हम दोनों को दो थाली में भोजन दें गएँ इसलिए हम और तुम दोनों ही साथ में भोजन करेंगे।  इस प्रकार रानी और दासी दोनों ने गुरु भगवान को नमस्कार करके भोजन किया। 

अब वह हर बृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और विष्णु भगवान का पूजन करने लगे बस बृहस्पति भगवान की कृपा से  रानी और दासी के पास काफी धन हो गया। रानी फिर उसी प्रकार आलस्य करने लगी तब दासी बोली देखो रानी तुम पहले इसी प्रकार आलस्य करती थी तब तुम्हें धन होना पड़ा इसका सभी धन नष्ट हो गया अब गुरु भगवान की कृपा से पुनः धन प्राप्त हुआ है।  तो फिर मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है इसलिए  हमें दान, पुण्य, भूखे मनुष्यों को भोजन करना चाहिए।  

पियाउ लगवाना चाहिए, ब्राह्मणों को दान देना चाहिए, कुआ तालाब बावड़ी आदि का निर्माण करवाना चाहिए। मंदिर पाठशाला बना कर दान देना चाहिए कुंवारी कन्याओं का विवाह करवा कर धन को अच्छे और धर्म के कार्यों में खर्च करो जिससे तुम्हारा और तुम्हारे कुल को  स्वर्ग होगा तथा तुम्हारे पित्तर प्रसन्न होंगे।  रानी ने इस प्रकार के सभी कार्य को किया जिससे उसका काफी यश फैल गया।

इधर राजा  परदेस में जाकर दुखी रहने लगा प्रतिदिन जंगल से लकड़ी काट कर लाता और  उन्हें शहर में बेचकर अपने दुखी जीवन को बड़ी कठिनाई से व्यतीत करता था। 1 दिन राजा दुखी होकर अपनी पुरानी बातों को याद करके रोने लगा तब वह जंगल में से बृहस्पति भगवान एक साधु का रूप धारण करके आए।  और बोलने लगे कि बेटा क्यों रो रहा है मुझको बताओ यह सुनकर राजा के  नेत्र में पानी भर गया साधु की वंदना कर बोला है प्रभु आप सब कुछ जानते हो इतना कहकर  अपनी संपूर्ण कथा बता दी महात्मा स्वभाव से दयालु होते हैं। 

 बोले राजा तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति भगवान का अपराध किया था।  जिस कारण तुम्हारी यह दशा हुई है अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो भगवान तुम्हें पहले से अधिक धनवान करेंगे देखो तुम्हारी स्त्री ने गुरु भगवान का व्रत आरंभ कर दिया है। और तुम मेरा कहा मान कर बृहस्पति वार को व्रत  तथा चने की दाल और गुड़ को  लोटे में लेकर केले की जड़ का पूजन करें।  तथा कथा कहें भगवान तुम्हारी सभी मनोकामना को पूर्ण करेंगे। 

 साधु को प्रसन्न देख राजा बोले हे प्रभु मुझे लकड़ी से इतना पैसा नहीं मिलता जिससे भोजन करने के उपरांत कुछ बचा सकूं मैंने रात्रि को सपने में अपनी रानी को व्याकुल देखा है।  मेरे पास कुछ भी नहीं है जिससे मैं उसकी खबर मंगा सकूं और फिर मैं कौन सी कथा सुनो या मुझ को कुछ मालूम भी तो नहीं है। साधु ने कहा हे राजा तुम किसी बात की चिंता मत करो बृहस्पतिवार के दिन रोजाना की तरह लकड़ियां लेकर शहर जाओ तुमको उस दिन से   रोज से दुगना धन प्राप्त होगा जिसे तुम भली प्रकार से भोजन  कर सकोगे और पूजन का सामान भी ले सकोगे गुरुवार की कथा इस प्रकार से है।

प्राचीन काल में एक बहुत ही निर्धन ब्राह्मण था जिसकी कोई भी संतान नहीं थी।  उसकी स्त्री बहुत ही मलीनता के साथ में रहती थी, और ना ही स्नान करती ना ही किसी देवता का पूजन करती  पहले भोजन करती उसके बाद ही कोई अन्य काम करती। ब्राह्मण देवता बहुत दुखी थे।  परंतु समझाने से कोई भी परिणाम नहीं निकला। 

भगवान की कृपा से ब्राह्मण के घर में एक लड़की पैदा हुई वह कन्या अपने पिता के घर में बड़ी होने लगी और वह बालिका प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करती थी। बृहस्पतिवार को व्रत रखती थी अपने पूजन पाठ को समाप्त करके स्कूल जाती अपने बैग मे जौ  को भरकर ले जाती और पाठशाला के मार्ग में डाल देती थी।  यह  सोने के हो जाते थे और लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती।  

एक दिन  बालिका सूप  में सोने के जौ  को फटक रही थी। तभी उसके पिता ने देखा और कहा बेटी सोने के जौ  को फटकने के लिए सोने का सूप होना चाहिए। दूसरे गुरुवार को इस कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पति देव से प्रार्थना की और कहने लगी मैं आपकी पूजा सच्चे मन से करती हूं। तो मेरे को सोने का सूप  दे दो बृहस्पति भगवान ने उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।  और रोजाना की तरह कन्या जौ रस्ते मे डाल दिया।  जब आ रही थी तो उसे सोने का सूप  मिल जाता है और वह उसे घर ले आती है और सोने के सूप मे  सोने की जौ को  साफ कर रही होती है तभी उस राज्य के  राजपूत्र वहां से निकलता है और वह यह सब देखता है और मंत्रमुग्ध हो जाता है। 

 घर आकर खाना पीना सब कुछ त्याग देता है और अपने पिता के साथ बैठ जाता है उसके पिता बोलते हैं कि क्या है कोई कारण है बताओ तब अपने पिता को सारी बात बताता है तो उसके पिता तैयार हो जाते हैं। और लड़की के घर अपने मंत्री को भेजते हैं शादी के लिए शादी के लिए तैयार हो जाते हैं दोनों की शादी हो जाती है।  कन्या के घर जाते ही पहले की भांति ब्राह्मण का घर दरिद्रता से भर जाता है, और उनका जीवन यापन बड़ी ही मुश्किल से होने लगता है। 

 तब कन्या का पिता को कुछ  दिन के बाद अपनी बेटी के पास में आता है उसे सभी हाल सुना देता है बेटी कहती है कि ठीक है मां को मेरे पास में भेजना अवश्य कुछ पैसे वैसे देख कर विदा कर देती है।  फिर भी कुछ नहीं होता है समझाने पर तब फिर वह अपने कन्या को बताता है तो वह कहती है कि अब मां को भेज दो मां को भेज देता है।  उसके घर आती है और उससे कहती है कि है मां पहले सुबह उठकर पूजा किया कर उसके बाद कोई दूसरा काम किया करो। पर उसकी मां एक भी ना सुनती हूं तब उसने गुस्से में मां को दरवाजे में बंद कर दिया और सभी सामान को निकाल दिया उसकी बुद्धि ठीक हो गई और उसे बाहर निकाल कर स्नान कराकर पूजा पाठ करवाया जैसे ही पूजा-पाठ उसने किया उसकी बुद्धि सही हो गई। और वह हर  बृहस्पतिवार को व्रत करने लगी तथा उनके घर में सुख समृद्धि भी आने लगी इस तरह से वह स्वर्ग को प्राप्त हो गए और अपना जीवन व्यतीत करने लगे इस प्रकार कथा कहकर साधु देवता वहां से लुप्त हो गए।

राजा वापस अपने घर आ गया और भ्रस्पतिवार का दिन आया उसने लकड़ी काट कर बेचा उस दिन से और दिन से ज्यादा उसको पैसे मिले। उसने उस पैसे से चना, गुड़ आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया उस दिन जो उसके सभी परेशानी  दूर होने लगे परंतु जब दोबारा गुरुवार का दिन आया तो राजा व्रत करना भूल गया इस कारण भगवान नाराज हो गए। संयोग से उसी दिन उस राज्य के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया था और शहर में घोषणा करा दी थी, कि सभी मनुष्य उसके यहां पर भोजन करेंगे जो उसकी आज्ञा का पालन नहीं करेगा उसे फांसी की सजा दी जाएगी। 

राजा की आज्ञा के अनुसार सभी लोग भोजन करते  है परंतु लकड़हारा कुछ देर से आया उसे राजा स्वयं अपने घर लेकर आया और भोजन कराने लगा तभी उसकी पत्नी आई और उसने देखा कि वहां पर सोने का हार खूंटी पर था वह लटक रहा था।  

अब वह वहां पर नहीं है रानी ने निश्चय किया कि इसी ने मेरा हाल चुरा लिया है। उस समय पुलिस को बुलाकर लकड़हारे को जेल खाने में डाल दिया लकड़हारा।  बहुत बुरी तरह दुखी हो गया और विचार करने लगा मुझे किस जन्म की सजा मिल रही है।  तभी साधु महाराज वहां पर आए और कहा कि तुमने  बृहस्पतिवार वार का व्रत नहीं किया इसकी वजह से तुम्हें झेलना पड़ रहा है लेकिन अब चिंता मत करो तुम्हें जेल खाने के दरवाजे पर चार पैसे मिलेंगे उनसे बृहस्पति देव का पूजन सामग्री लेना और उनसे पूजा करना। 

तुम्हारे सभी दुख दूर हो जाएंगे और उस राजा को रात में स्वप्न में  बृहस्पति देव ने कहा कि उसे उसे छोड़ दो वरना सभी राज्य नष्ट कर दूंगा इस प्रकार की रात्रि मे स्वपन को देखकर प्रातः काल उठा और उस लकड़हारे से राजा ने माफी मांगी और से वस्त्र आदि देकर विदा कर दिया। 

 अब राजा एक दिन विचार करने लगा की रानी किस प्रकार से होगी गुरु भगवान से प्रार्थना की और वह अपने राज्य को लौट गया। जब वह अपने राज्य को वापस आया तो उसने देखा कि वहां पर सब कुछ बदल गया था।  तब आश्चर्यचकित हो गया लेकिन रानी को पता चल गया था कि राजा आ रहे हैं तो उसने अपनी दासी को भेज दिया था कि जाओ नहीं तो राजा वापस न चले जाएं। राजा को दासी लेकर आई रानी के पास में तब राजा को बहुत ही क्रोध आया और क्रोध में आकर उसने पूछा कि यह सब कैसे हुआ तब रानी ने बताया यह सब  बृहस्पति भगवान की कृपा से प्राप्त हुआ है। 

 उनकी व्रत के फल की वजह से यह मैं राजपाट वापस मिला है। तब राजा ने कहा कि बृहस्पति भगवान की पूजा तो सभी लोग करते हैं मैं रोज करूंगा और दिन में तीन बार कथा करूंगा रोज व्रत करूंगा अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बनी रहती है।  दिन में तीन बार कथा कहता 1 दिन राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहन से मिलाए इस प्रकार निश्चय करके राजा घोड़े पर सवार होकर अपनी बहन के पास चला गया।
 
 मार्ग में उसने देखा कि कुछ आगे एक मुर्दे को ले जा रहे थे राजा ने उनसे कहा कि अरे भैया मेरी कथा सुन लो सब ने कहा हमारा आदमी मर गया है, उसे अपनी कथा की पड़ी है परंतु कुछ आदमी बोले अच्छा कहो तुम अपनी कथा सुना लो राजा न दाल निकाली और अपनी कथा सुनानी शुरु की जैसा ही कथा आदि हुई मुर्दा हिलने लगा और कथा समाप्त होते ही मुर्दा  राम-राम कह कर खड़ा हो गया। आगे मार्ग में किसान खेत में हल चलाता मिला राजा ने उसे देखा और बोला भैया मेरी कथा सुनने का जब तक मैं तुम्हारी कथा सुनुँगा  4 हरैया जोत लूंगा।  जैसे ही राजा आगे बढ़ा बैल पछाड़ खाकर गिर गया और किसान के पेट में दर्द होने लगा। 

बुढ़िया वहां पर थी वह दौड़ती हुई आई उसने पुत्र से सभी हाल पूछा सभी हाल बता दिया, और राजा के पास दौड़कर गई उसने बोली मैं तुम्हारी कथा सुनूंगी चलो मेरे खेत पर चल कर कह दो राजा ने बुढ़िया की खेत पर कथा कही जिससे बैल  खड़े हो गए और किशन का पेट का दर्द भी सही हो गया। राजा अपनी बहन के घर कुशल पूर्वक पहुँच गया।  बहन ने भाई की खूब मेहमानवाजी  की दूसरे दिन प्रातः  काल राजा  ने कहा कि मुझे यहां कोई ऐसा मानुष है जिसने भोजन ना किया हो हमारी कथा सुन ले। 

 बहन ने बोला या देश ऐसा सर्वप्रथम यहां सभी लोग भोजन करते हैं फिर कोई काम करते हैं फिर भी मैं देख कर आती हूं एक कुम्हार  का लड़का मिला जो बहुत ही बीमार था। उसने 3 दिन से भोजन नहीं किया था राजा तैयार हो गए कथा सुनाने के लिए और वो लोग  भी तैयार हो गए कथा सुनने के लिए राजा ने वहां जाकर बृहस्पति वार की कथा कही जिसे सुनकर कुमार का लड़का ठीक हो गया। 

 अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी एक दिन राजा अपनी बहन से कहने लगा अब मैं अपने घर को जाऊंगा तू भी तैयार हो जा अपने बच्चों को ले ले पर बहन की सास ने बोली तू चली जा बच्चे नहीं जाएंगे तेरे भैया के कोई भी बच्चा नहीं है सुनकर राजा बहुत दुखी हो गया। और अपने नगर को लौट आया हमारा मुंह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन  भी नहीं किया रानी बोली हे प्रभु जैसे बृहस्पति भगवान ने हमें सब कुछ दिया है हमें संतान भी अवश्य देंगे। 

 उसी रात्रि को बृहस्पति देव ने राजा से स्वपन मे  कहा कहा तेरी रानी  गर्भ से है राजा को बहुत ही खुशी मिली और नौवें महीने में उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ तब राजा की बहन बधाई देने के लिए आए।  तब राजा की पत्नी ने बोला बुलाने पर नहीं अब क्यों आई तब उसकी बहन ने बोला कि बृहस्पति भगवान ऐसा ही है सब की मनोकामना पूर्ण करते हैं जो भगवान का प्रेम पूर्वक व्रत करता है कथा सुनता है वह व्यक्ति उसकी सभी मनोकामना पूरी करते हैं बोलो श्री बृहस्पति भगवान की जय।

अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा और पुण्य प्रताप विधि


*बृहस्पतिजी की आरती*

जय जय बृहस्पति देवा, प्रभु जय  बृहस्पति देवा     ।   भक्त   जनन   के  संकट,  दूर  करो  देवा       ।। जय ० ।।
पीतवस्त्र     पीताम्बर     मुख      चन्दन     राजे       पीत पुष्प अरुपीत फल सम्मुख धर राखे       ।। जय ० ।।
धूप   दीप  नैवेद्य  भक्ति  से  अर्पण  है तुम  को     ।   और  कुछ  नहीं  मोपे  अर्पण  करुँ तुमको       ।। जय ० ।।
मैं     मूरख     अज्ञानी  जानूँ  नहिं  पूजा  तेरी             जो  कोई  त्रुटि रही  प्रभु क्षमा करो मेरी         ।। जय ० ।।
शरण     पड़ा     चरणों     मे     निर्धन    दास तेरा   ।    और कछु नहिं चाहूँ  बस उद्धार करो मेरा         ।। जय ० ।।
बृहस्पतिजी  की  आरती  जो  कोई  जन  गावे        ।    दुःख  दारिद्र  दलन  हो  सुख सम्पति पावें      ।। जय ० ।।
मो     पतित     दीन   पर  प्रभु जी अब कृपा कीजै    ।    सेवक समझ आपनो चरण रख लीजै              ।। जय ० ।।

(बृहस्पतिजी कथा सम्पूर्ण )