vaibhav laxmi vrat katha book in hindi 

नमस्कार दोस्तों हमारा देश भारतीय संस्कृति का है।  यहां पर  देवी देवताओं की पूजा की जाती है,  और मान्यता  है तथा यहां पर बहुत सारे संस्कार हैं जिनके नियमों का पालन हमें करना पड़ता है , और हम  सभी देवी देवताओं को पूजते हैं  उन्हें पसंद करते हैं ताकि हम उनसे अपनी मनपसंद की चीजें मांग सके और उनकी छत्रछाया हम पर बनी रहे आज मैं यहां पर आपसे बात करने वाला हूं मां लक्ष्मी के बारे में और उनके व्रत  के बारे में उनके व्रत के प्रभाव के बारे में।

लक्ष्मी स्तवन

या रक्तांबुजवासनी विलासनी चंडासु  तेजस्वानी l

या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी  या श्री  मनोल्हादिनी ll

या रत्नाकरमन्थनात्प्रन्गटिता विष्णोस्वया गेहनी l

सा मां पातु मनोरमा भगवती लष्मीश्च पदमावती ll

श्री गज लक्ष्मी माता



श्री अधि  लक्ष्मी माता



श्री विजयालक्ष्मी माता




 श्री ऐश्वर्या लक्ष्मी माता 




श्री  वीर लक्ष्मी माता




 श्री धान्यलक्ष्मी  माता 





श्री संतान लक्ष्मी माता


वैभव लक्ष्मी व्रत करने  नियम 

१. यह व्रत सौभाग्यशाली स्त्रियां करें तो उनको उत्तम फल मिलता है । पर घर में यदि सौभाग्यशाली स्त्री ना हो तो कोई भी स्त्री एवम  कुमारी भी व्रत कर सकती हैं।

२.  स्त्री के बदले पुरुष भी यह व्रत करे  तो फल अवश्य मिलता है।

३. यह व्रत पूरी श्रद्धा एवं पवित्र भाव से करना चाहिए। खिन्न होकर या  बिना भाव से यह व्रत नहीं करना चाहिए।

४. यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है व्रत शुरु करते 11 या  21 शुक्रवार की मन्नत रखनी पड़ती है, और पुस्तक में लिखी शास्त्रीय विधि अनुसार ही व्रत करना चाहिए मन्नत के शुक्रवार पूरे होने पर विधि पूर्वक और इस पुस्तक में दिखाए गई शास्त्रीय रीति अनुसार उद्यापन विधि करनी चाहिए या विधि सरल है शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत न करने पर  जरा भी फल नहीं मिलता।

५. एक बार व्रत पूरा करने के पश्चात फिर मन्नत कर सकते हैं और फिर से व्रत कर सकते हैं।

६. माता लक्ष्मी देवी के अनेक स्वरुप उनमें उनका धनलक्ष्मी स्वरुप ही वैभव लक्ष्मी है।  और माता लक्ष्मी को श्री यंत्र काफी प्रिय हैं व्रत करते वक्त पुस्तक में देवी मां लक्ष्मी जी के हर स्वरुप कोश्री  यंत्र को प्रणाम करना चाहिए तभी व्रत का फल मिलता है।  अगर हम इतनी भी मेहनत नहीं कर सकते तो लक्ष्मी देवी भी हमारे लिए कुछ करने को तैयार नहीं होगी हम पर कृपा नहीं होगी।




७. व्रत के दिन सुबह से ही  जय मां लक्ष्मी जय महालक्ष्मी का रट  मन ही  मन करना चाहिए और मां का पुरे भाव से ही स्मरण  करना चाहिए। 

८. शुक्रवार के दिन यदि आप प्रवास या  यात्रा पर गए हो तो यह शुक्रवार  छोड़कर उन के बाद के शुक्रवार को व्रत  करना चाहिए। पर व्रत अपने ही घर में करना चाहिए सब मिलाकर जितने शुक्रवार की मन्नत ले  उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिए।

९. घर में सोना न  हो तो चांदी की चीज पूजा में रखनी चाहिए अगर वह भी ना हो तो नकद  रुपया रखना चाहिए।

१०. व्रत पूरा होने पर काम से कम 7 स्त्रियों को या आपकी इच्छा अनुसार जैसे 11, 21, 51, 101, स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी व्रत की पुस्तक कुमकुम का तिलक करके भेंट के रूप में देना  चाहिए जितनी ज्यादा  भेंट आप देंगे उतनी मां लक्ष्मी की ज्यादा कृपा होगी और मां लक्ष्मी जी का यह अद्भुत व्रत का ज्यादा प्रचार होगा।

११. व्रत के शुक्रवार को स्त्री  रजस्वला  हो या सूतकी  हो तो वह शुक्रवार छोड़ देना चाहिए और बाद  के शुक्रवार से व्रत शुरु करना चाहिए पर जितने शुक्रवार की मन्नत मानी हो उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिए।

१२. व्रत की विधि शुरू करते वक्त लक्ष्मी स्तवन का एक बार पाठ करना चाहिए।

१३. व्रत के दिन हो सके तो उपवास करना चाहिए और शाम को व्रत की विधि करके मां प्रसाद   लेकर शुक्रवार करना चाहिए।  अगर ना हो सके तो फलाहार यह एक बर भोजन करके शुक्रवार करना चाहिए। अगर व्रत  धारी का शरीर बहुत कमजोर हो तो दो बार भोजन कर  ले सबसे महत्त्व की बात यह है कि व्रत धारी मां लक्ष्मी जी पूरी श्रद्धा और भावना रखें और मेरी मनोकामना पूरी करेगी ऐसा कठोर संकल्प करें।

मां वैभव लक्ष्मी व्रत कथा।

एक बड़ा शहर था इस शहर में लाखों लोग रहते थे पहले के जमाने के लोग साथ-साथ रहते थे और एक दूसरे के काम आते थे पर नए जमाने के लोग का स्वरुप ही अलग सा है।  सब अपने-अपने काम में मस्त रहते हैं किसी को किसी की परवाह नहीं घर के सदस्यों को भी एक दूसरे की परवाह नहीं होती भजन कीर्तन भक्ति भाव दया माया पर्व का जैसे संस्कार कम हो गए।  शहर में बुराइयां बढ़ गए हैं, बहुत से गुनाह  शहर में होते थे कहावत है कि हजारों निराशा में एक अमर आशा छिपी हुई इसी तरह इतनी सारी बुराइयों के बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

ऐसे अच्छे लोगों में शीला और उसके पति की गृहस्थी  मानी जाती थी।  शीला धार्मिक और संतोषी थी।  पति भी और सुशील था।  और उसका पति ईमानदारी से जीते थे वे किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु  भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत करते थे   लोग उनकी गृहस्थी की  सराहना भी करते थे।  उनकी जिंदगी  खुशी खुशी चल रही थी पर कहा जाता है कि कल की गति कल है विधाता के लिखें कोई बदल नहीं सकता ।

शीला के पति के पिछले जन्म के कर्म भोग ने को बाकी रह गए होंगे कि वह बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा वह जल्द   से जल्द करोड़पति होने के सपने  देखने लगा इसलिए वह गलत रास्ते पर चढ़ गया और करोड़पति की बजाए रोड पति बन गया यानी रास्ते पर भटकते भिकारी जैसी उसकी हालत हो गई थी।  सहमत राजू आर एस चरस गांजा बगैरा लेने लगा था  उसमें शिला  का पति भी फंस  गया दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई जल्द से जल्द पैसे वाला बनने की लालच दोस्तों के साथ रेस जुआ भी खेलने लगा।  इस तरह बचाव धनराशि पत्नी की गहने सब कुछ गावं  दिया था।  उसके बजाए घर में दरिद्रता और भुखमरी फैल गई सुख सिखाने की वजह दो वक्त भोजन के लाले पड़ गए और शीला को रोज पति की गालियां खाने का वक्त आ गया था। 

 शीला सुशीला  और संस्कारी थी  उसके  पति के बर्ताव से बहुत दुख हुआ किंतु वह भगवान पर भरोसा करके बड़ा दिल करके  दुख सहने लगी।   सुख के पीछे दुख दुख के पीछे सुख आता है इसलिए दुख के बाद सुख आएगा ऐसी श्रद्धा के साथ शीला प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी । इस तरह शीला  दुख सहते सहते प्रभु भक्ति में वक्त बिताने लगी अचानक दिन दोपहर को उनके दरवाजे पर  किसी ने दस्तक दी  शिला सोच मे  पड़ गई कि मुझ जैसे गरीब के घर  कौन आया होगा फिर भी द्वार पर आए हुए अतिथि  का आदर करना चाहिए।  ऐसे हमारे आर्य  धर्म में लिखा हुआ है शिला  खड़े होकर द्वार खोला देखा तो सामने एक मां जी  थी बड़ी उम्र की लगती थी।  किंतु उनके चेहरे और आंखों मैं मानो अमृत रहता था उनका भावे चेहरा करुणा और प्यार से झलकता था।  उनको देखते इस शिला के  मन में अपार शांति छा गई वैसे शीला इस माँ  जी को पहचानती तो नातीफिर  भी उनको देखकर शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया शीला मां जी को आदर के साथ घर में लाई आंगन  में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था अतः शिला  ने चादर पर उनको बैठा  दिया।

मां जी ने कहा सिला मुझे पहचाना नहीं सीधा निसंकोच कर कहा मां आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है बहुत शांति हो रही है  ऐसा लगता है कि मैं बहुत दिनों से जिसे ढूंढ रही थी वह आप ही हो  पर मैं आपको पहचान नहीं पाई माजी ने हंसकर कहा क्यों भूल गई।   लक्ष्मी जी के मंदिर में भजन कीर्तन होते हैं तब मैं वहां आती हूं वहां हर शुक्रवार  को हम मिलते हैं पति गलत रास्ते पर  चला गया है तब शिला बहुत दुखी हो गई थी और दुख की मारी लक्ष्मी जी के मंदिर में भी नहीं जाती थी।  लोगों के साथ नजर मिलाते दिन से शर्माते थी उसने याददाश्त पर जोड़ दिया पर याद नहीं आ रही थी।

तभी माजी ने कहा तू लक्ष्मी जी के मंदिर में कितने मधुर भजन गाती थी।  अभी तो दिखाई नहीं देती थी इसलिए मुझे लगा  कहीं  बीमार तो नहीं हो गई।  ऐसा सोच कर मैं तुझे मिलने चली आई हूं।  माँ जी के  शब्दों को सुनकर शीला का हौसला मिला  और  उसकी आंखों में आंसू आ गए मां जी के सामने वह फूट फूट  कर रोने लगी यह देखकरमाँ जी ने  शीला के नजदी  सरक कर और उस की पीठ पर प्यार भरा हाथ से प्रस्तावना देने लगी।

मां जी ने कहा बेटी सुख और दुख तो आते जाते रहते हैं। सुख के पीछे दुःख  तो दुख के पीछे सुख भी आता है।  सब्र रखो  बेटी और तुझे क्या परेशानी है तेरे दुख की बात मुझे सुना तेरा मन हल्का हो जाएगा तेरे दुख का कोई उपाय भी मिल जाएगा।

मां जी की बात सुनकर शिला  के मन को शांति मिली उसने मां जी को कहा मां गृहस्थी  अछि थी भरपूर  खुशी भी थी  मेरे पति भी सुशील थे भगवान की कृपा से पैसे  में हमें कोई कमी नहीं थी।  हम शांति से गृहस्थी चलते  ईश्वर भक्ति में अपना वक्त व्यतीत करते थे।  यह का एक हमारा भाग्य हमसे रुठ गया मेरे पति का बुरी दोस्ती हो गई बुरी दोस्ती की वजह से वह शराब  चरस गांजा  आदि का  शिकार हो गए और सब  कुछ गवा दी और हम रास्ते के भिकारी  बन गए ।

यह सुनकर माजी ने कहा सुख के पीछे दुख और दुख के पीछे सुख आता है।  इंसान को अपने कर्म भुगतने पढ़ते हैं  तो चिंता मत कर तू बुरे दिन भोग  चुकी है अब tumhare सुख को दिन अवश्य आएंगे। मां लक्ष्मी जी प्रेम और करुणा का अवतार है।  इसलिए सब्र  रख और मां लक्ष्मी जी का व्रत कर सब कुछ ठीक हो जाएगा।  मां लक्ष्मी जी का व्रत  करने की बात सुनकर शीला की चेहरे पर चमक आ गई  पूछा मां लक्ष्मी जी का व्रत कैसे  किया जाता है वह मुझे समझाएं मैं  अवश्य करूंगी। माँ  जी ने कहा बेटी मां लक्ष्मी जी काव्रत सीधा-साधा व्रत है कई  लोग तो यह व्रत गलत तरीके से करते हैं।  जिनसे उन्हें फल नहीं मिलता है कई लोग कहते हैं कि सोने के गहने की हल्दी कुमकुम से पूजा करो बस व्रत  हो गया पर ऐसा नहीं कोई भी व्रत विधि  पूर्वक करना चाहिए।  तभी उसका फल मिलता है।  व्रत शुक्रवार को करना चाहिए सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े पहनने के बाद सारा दिन मन में जय मां लक्ष्मी जय मां लक्ष्मी का रट  करते हुए किसी की चुगली नहीं करनी चाहिए किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए किसी के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहिए शाम को पूर्व दिशा में मुँह करके आसन पर बैठ  जाओ सामने पाटा  रख उसके ऊपर  रुमाल  चावल का छोटा सा ढेर  पर पानी से भरा तांबे का कलश रखो कलश पर एक कटोरी रखो कटोरी में एक सोने का गहना रखो सोने का ना हो तो चांदी का भी चलेगा चांदी का ना हो तो नाक चुनियाँ  भी चलेगा बाद में घी का दीपक जलाकर  रखो मां लक्ष्मी जी के बहुत स्वरुप है और मां लक्ष्मी जी को श्री यंत्र  की पूजा और लक्ष्मी जी के पूजन विधि करते वक्त सर्वप्रथम  लक्ष्मी जी के विविध रुप का सच्चे  दिल से दर्शन करो मंत्र और मां लक्ष्मी जी के चित्र  विविध रूपों की छवि इसके बाद लक्ष्मी स्तवन  का पाठ करो 

vaibhav laxmi pooja

शाम को कोई मीठी चीज बनाकर उसका प्रसाद रखो ना हो सके तो सका या गुड भी चल सकता है।  फिर पूजा करके 11 बार सच्चे मन से जय मां लक्ष्मी बोलो।

 जो मनोकामना हुआ पूरी करने मे  मां से लक्ष्मी से बिनती करो फिर मां का प्रसाद बातों और थोड़ा प्रसाद अपना खा लो।

अगर आपरह सकती हो तो सारा दिन उपवास रखो उसे प्रसाद खाकर शुक्रवार करो। पूरा दिन  ना रह सकती हो तो एक बार शाम को प्रसाद ग्रहण करते समय खाना खा लो अगर थोड़ी शक्ति भी ना हो तो दो बार भोजन कर सकते हो बाद में कटोरी में रखा गया खीर खा  लो।

कलश  का पानी तुलसी  में डाल दो और चावल पक्षियों को डाल दो इस व्रत का  शास्त्री विधि अनुसार व्रत  करने से उस फल अवश्य मिलता है।  इस व्रत  के प्रभाव से सब प्रकार की विपत्ति दूर होकर आदमी  मालामाल हो जाता है।

संतान ना हो तो उसे संतान प्राप्ति होती सौभाग्यवती सौभाग्य रहता है कुंवारी लड़की को  मन भवन पति मिलता है। शीला यार सुनकर आनंदित हो गई।  फिर पूछा मां आपने व्रत तो बता दिया मै अवस्य करुँगी।  उद्यापन विधि किस तरह करनी चाहिए ये मुझे बतलाये ।

माजी ने कहा  जो मन्नत मानी   लक्ष्मी व्रत  श्रद्धा भावना से करना चाहिए।  उद्यापन विधि मैं   बताती हूँ ध्यान से सुनो। 

वैभव लक्ष्मी व्रत' उद्यापन विधि

आखिरी शुक्रवार को खीर बना कर रखो पूजन विधि यह शुक्रवार को करते हैं वैसे ही करनी चाहिए पूजन विधि के बाद श्रीफल थोड़े और कम से कम 7 कुंवारी यह सब  कुमकुम तिलक करके साहित्य संगम की वह सिंगर की एक-एक पुस्तक  देनी चाहिए। सबको  पैसा देना चाहिए फिर धनलक्ष्मी सुबह लक्ष्मी  जी  की छवि को प्रणाम करूं लक्ष्मी जी का व्रत फल  देने वाला है।  प्रणाम करते वक़्त  भावुकता से मां की प्रार्थना करते वक्त  हे  धनलक्ष्मी है। हे मां वैभव लक्ष्मी  सच्चे ह्रदय से आपका वैभव लक्ष्मी माँ आपक व्रत पूरा  किया है तो है मां हमारी जो मनोकामनाएं वह बोलो मनोकामना पूर्ण करो हमारा सबका कल्याण करो जिस इंसान के न हो उसे संतान देना सौभाग्य शाली स्त्री का सौभाग्य रखना  कुवारी  लड़की को मनभावन पति  देना।  सबको सुखी करना है मां आपकी महिमा अपरम्पार है।

इतना कह कर शिला ने भी संकल्प लिया और  कहा  जैस माँ जी ने बताया है वेऐसे ही शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत करुँगी। 

शीला ने संकल्प करके आंखें खोली तो सामने कोई न था यह विस्मित हो गई माजी कहां गया माझी दूसरा कोई न था साक्षात लक्ष्मी जी सीधा लक्ष्मी जी की भक्ति इसलिए अपने भक्तों को रास्ता दिखाने के लिए मां लक्ष्मी देवी आयी थी।  

दूसरे दिन शुक्रवार था स्नान करके साफ़ कपड़े पहन का सीधा पूरे भव से जय मां लक्ष्मी जय मां लक्ष्मी का मनी मन पठान  करना लगी सारा दिन किसी की चुगली ना कि शाम हुई तब  मुंह धो कर सीधा पूजा करने बैठ गयी और प्रसाद ग्रहण किया। 

घर मे सोने के गहने बहुत थे पर पति ने  गिरवी रख दिए थे।  नाक कि चुन्नी बच गई थी नाक की चुन्नी   निकालकर उसे धो कर   कटोरी में रख दी सामने पाटे पर  लोटे मे  मुट्ठी भर चावलरख दिया । उस पर तांबे का कलश  पानी भर कर रखा उसके ऊपर चुन्नी वाली कटोरी रखी फिर माँ जी ने जैसे कहा था वैसे ही  विधि  अनुसार  स्तवन  पूजा की।  

यह प्रसाद पहले पति को खिलाया आपके बाद खुद  खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया कुछ दिन उसने शीला को मारा नहीं सताया भी नहीं शीला को बहुत आनंद हुआ उसके मन में वेब  व्रत के लिए स्रद्धा  बढ़ गई।

शीला ने पूर्ण श्रद्धा भक्ति से 21 शक्रवार तक व्रत किया माँ  वैभव लक्ष्मी  21 शुक्रवार को माजी के कहे  मुताबिक उद्यापन विधि कर के सभी स्त्री को  पुस्तकें दी। फिर माताजी के धनलक्ष्मी स्वरुप की छवि को मन  के  भाव से मन मन प्राथना करने लगी हे मां लक्ष्मी मैंने आपका वैभव लक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी यह मेरी मनोकामना पूरी करो।  सबका कल्याण करो जिसे  संतान ना हो उस संतान देना सौभाग्य शाली स्त्री को उसका सौभाग्य देना।  कुंवारी लड़की को मन भावन  पति देना जो आपका चमत्कारी व्रत करे उसको खुशियाँ देना । आपकी महिमा अपार है ऐसा बोल कर लक्ष्मी जी के धनलक्ष्मी सरुप की छवि को प्रणाम किया।

इस तरह शास्त्रीय विधि पूर्वक शीला ने श्रद्धा सेवक किया और तुरंत ही उसे फल मिला उसका पति गलत रास्ते पर चला गया था वह अच्छा आदमी हो गया और बहुत  मेहनत करके काम  करने लगा। महालक्ष्मी जी के वैभव  लक्ष्मीव्रत  के प्रभाव से उसको ज्यादा मुनाफा होने लगा उसने तुरंत शीला के गिरवी रख गहने छुड़ा लिए घर में धन की बारिश  आ गई पहले जैसी शुभ शांति छा गई बोला  प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी माँ लक्ष्मी जी की  शास्त्री विधि पूजा करने लगी । हे मा धनलक्ष्मी आप जैसे शीला पर प्रसन हुयी  उसी  तरह आपका व्रत  करने वाला सब पसंद होना सब को सुख शांति देना जय धनलक्ष्मी मां।

जय माँ वैभव लक्ष्मी।